जनजाति विकास में पंचवर्शीय योजनाओं की भूमिका

(जषपुर जिला के ग्राम सकरडेगा के उराव जनजाति के विषेश संदर्भ मे)

 

Dr. Nister Kujur

 

Sr. Asstt. Professor, SoS in Sociology, Pt. Ravishankar Shukla University, Raipur (C.G)

 

 

साराँश

भारत विष्व का दूसरा सबसे बडा देश है जहां कुल जनसंख्या का 8.2 प्रतिशत आबादी जनजातियों का है तथा यह समूह 532 से भी अधिक उप-समूहों में विभक्त है। जनजातियों की यह समूह देश के दुर्गम पहाडी, पडारी भागों में निवास करती रही है । इन जनजातीय लोगों का जीवन स्वतंत्रता के पूर्व अत्यन्त ही दयनीय अवस्था में आजीविका करती थी जिसके फलस्वरूप ही इस समूह को शोधकत्र्ताओ द्वारा किसी ने खानाबदोष झूड, वनवासी, पिछडी जाति, वन्य जाति एवं गिरीजन इत्यादि कई नामों से पुकारा गया है, इसका कारण इनका निम्न सामाजिक-आथर््िाक स्थिति ही था।

 

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सरकार द्वारा इनके सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार करने हेतु संवैधानिक प्रावधान किये गये, अनुच्छेद 342 के तहत् राष्ट््रपति द्वारा अधिसूचित किया गया है तथा संविधान की धारा 38 एवं 46 में इनके शोषण से रोकथाम व आर्थिक विकास, अनुच्छेद 46 में शैक्षणिक वा आर्थिक, अनुच्छेद 16 में सरकारी नौकरियों, अनुच्छेद 330,332एवं 332 में राजनीतिक अधिकार, अनुच्छेद 164 338 में इन वर्गो के विकास के लिए परिषद का गठन किया गया है । इस प्रकार संवैधानिक व्यवस्था किये जाने के पश्चात् कई योजनाओं का क्रियान्वयन किये गये, वास्तव में संवैधानिक प्रावधान का उद्वेश्य ही यही है जिससे इनका जीवन स्तर में चहुमूखी विकास करके आत्मनिर्भता पैदा की जा सके। मेनन (2000)1 ने अपने अध्ययन में संवैधानिक प्रावधान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि संवैधानिक प्रावधान निर्देश मात्र नहीं है बल्कि इनके जरिए ठोस नतीजे हासिल करने हेतु एक तरह का पुख्ता और व्यापक प्रबंध किया गया है ।

 

संविधान  में उपरोक्त प्रावधान से जनजातियों को विशेष संरक्षण प्राप्त हुआ जिसके परिणामस्वरूप इन वर्गो के विकास का मार्ग प्रसस्त हुआ और इनके विकास के लिए प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही प्रशासनीक लक्ष्य का निर्धारण किया गया इस तथ्य का प्रमाण चैधरी (1981)2,, अप्राजिता (1994)3, तथा सिंह एवं सिंह (1998)4 के शोध अध्ययनों में भी पाया जाता है।

 

पंचवर्षीय योजना द्वारा जनजाति विकास के प्रयास:-

प्रथम पंचवर्षीय योजना 1951-56 में  कुल 1960 करोड रूपये व्यय करने का प्रावधान था इस योजना में जनजातियों के स्वास्थ्य, अवास और  संचार सुविधा के विकास पर जोर दिया गया इस मद के सरकार कुल 19.83 करोड रूपये व्यय किया ।

 

इसी तरह दूसरी पंचवर्षीय योजना 1956-61 की कुल बजट 4672 करोड रूपया था इस योजना में जनजाति विकास में 42.92 करोड रूपये व्यय किया गया जिसमें कृषि, शिक्षा,स्वाास्थ्य, और संचार साधनों के विकास को केन्द्र बनाया गया था।

 

 

तृत्तीय पंचवर्षीय योजना 1961-66 इस अवधि में योजना की कुल राशि 88577 कारोड रूपये का प्रावधान किया गया था। इस योजना में जनजाति विकास को विस्तार करके उनके अवास, आर्थिक , स्वास्थ्य, जनजाति विकासखण्ड की स्थापना, पोस्ट-मैट््िरक छात्रावास, कन्या छात्रावास, प्रशिक्षण और रोजगार संस्थान स्थापित करने की दिशा में योजना के कुल प्रावधान में से 99.14 करोड रूपया व्यय किया गया था। इसी प्रकार वार्षिक योजना 1966-69 में कुल राशि 6625 करोड व्यय करने का लक्ष्य रखा गया था इस योजना अवधि में जनजाति विकास के लिए नई योजना का क्रियान्वयन न करते हुए तृतीय पंचवर्षीय योजना में क्रियान्वित योजना पर ही कार्य किया गया इसमें 68.49 करोड रूपया व्यय किया था।

 

चतुर्थ पंचवर्षीय योजना 1969-74 इस योजना में कुल 16201 करोड व्यय करने का प्रावधान किया गया था जिसमें जनजाति विकास के मद में कुल 3041.17 करोड रूपये जुटाया गया था और कृषि उत्पपदन में वृद्वि, भूमिहीन मजदूरों के व्यवसाय में आधुनिकता लाने का प्रयास और आदिम जनजाति विकास अभिकरण स्थापित करने पर जोर दिया गया । इसी तरह पांचवी पंचवर्षीय योजना में 1974-79 में कुल बजट प्रावधान रूपये 39426 करोड का प्रावधान रखा गया जिसमें जनजाति विकास में 190 करोड का व्यय किया गया जिसमें जनजाति उप-योजनाओं का निर्माण किया गया था।

 

छठवीं पंचवर्षीय योजना 19809-85 में 109292 करोड का प्रावधान किया गया था जिसमें जनजाति विकास में 3409 करोड रूपया खर्च किया गया जिसमें सामाजिक-आर्थिक विकास में बुनियादि ढांचा के विकास पर जोर दिया गया जिसके अन्तर्गत भूमि सुधार, बिजली, स्वच्छ पेयजल, बैंक ऋण, भूमि आबंटन आदि पर ध्यान केन्द्रित किया गया इस अवधि में देश में कुल 72 आदिम जनजातियां थी।

 

सन् 1985-90 सातवीं पंचवर्षीय योजना का धन व्यय करने का कुल प्रावधान 218729 करोड थी जिसमें जपजाति विकास पर 847 करोड रूपया खर्च किया गया जिसमें सामाजिक-आर्थिक विकास में जागरूकता पैदा करना, शोषण रोधी उपाय करना, लुप्त प्राय जानजाति पर विशेष ध्यान देना और जनजातियों क्षेत्र में बिजली, सिंचाई, खनन एवं पुनर्वास की व्यवस्था करना प्रमुख उद्वेश्य था ।

 

वार्षिक योजना 1990-91 में कुल बजट 58369 करोड रूपया था जिसमें जनजाति विकास में 233.5 करोड रूपया व्यय किया था इस योजना में जनजाति विकास मद पर प्री-मैट््िरक छात्रावास का निमार्ण करना, बुक बैंक योजना से लाभ पहुंचाना, कन्या एवं बालक छा़त्रावास की स्थपना करना तथा रोजगार के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था करना एवं पेयजल की व्यवस्था करना इसी तरह  दसवीं पंचवर्षीय योजना 2007-2012 में जनजाति विकास पर कुल 525614.96 करोड रूपया व्यय किया था। उपरोक्त तथ्यों से ज्ञात होता है कि पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा जनजाति विकास के लिए अनेकों प्रयास की गई है तथा करोडों रूपये व्यय किया गया है। 

 

प्रस्तुत अध्ययन में सरकार के इन प्रयासों का अध्ययपगत जनजाति के विकास में पंचवर्षीय योजनाओं की भूमिका कहां तक कारगर सिद्व हुई है ज्ञात करने का प्रयास किया गया है।

 

उरांव जनजाति का संक्षिप्त परिचय:-

उरांव जनजाति द्रवणीयन वंश परिवार का एक जनजाति है, डाॅल्टन (1872)5 ने अपने अध्ययन में छोटानागपुर के पठार को उरांव जनजाति का प्रमुख निवास क्षेत्र बतलाया है । यह जनजाति मूलरूप से कुंडूख भाषा बोलती है।6 किन्तु यह जनजाति पलायन करके देश के उत्तरी-पूर्वी राज्यों में फैल गई और झारखण्ड, छत्तीसगढ, ओडिसा, पश्चिम बंगाल, असम बिहार एवं त्रिपुरा आदि राज्यों में निवास करती है।7 छत्तीसगढ राज्य में यह जनजाति जशपुर, रायगढ, सरगुजा, कोरिया जिला में निवास करती है। यह जनजाति पारम्परिक रूप से कृषि, वनोपज संग्रहण, मजदूरी पर आजीविका के लिये निर्भर रही है किन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् जनजाति विकास के निरन्तर प्रयास किये जाने से शिक्षा अर्जित करके यह समूह अपने जीवन स्तर को सुधार रही है।

 

अध्ययन क्षेत्र का संक्षिप्त परिचयः-

प्रस्तावित अध्ययन  जशपुर जिला के ग्राम सकरडेगा के उरांव जनजाति पर आधारित है।  ग्राम सकरडेगा जशपुर जिला के जशपुर विकासखण्ड के आरा पंचायत का एक गांव है। यह गांव जिला मुख्यालय से पूर्व दिशा में 25 कि.मी. की दूरी पर झारखण्ड राज्य की सीमा पर स्थित है। ग्राम सकरडेगा गांव में कुल 08 टोला-पारा है  में कुल परिवार की संख्या 126 है तथा गावं की कुल जनसंख्या 696 है। ग्राम में उरांव जनजाति के 31 परिवार है जिसमें इनकी कुल जनसंख्या 252 है इनमें पुरूष 129 एवं महिला 123 है। सकरडेगा ग्राम में  07 आंगनवाडी केन्द्र, 03 प्राथमिक स्कूल तथा 01 माध्यमिक स्कूल स्थापित है। सकरडेगा ग्राम जिला मुख्यालय जशपुर से प्रधानमंत्री सडक मार्ग से जुडा है। प्रशासनीक दृष्टि से सकरडेगा ग्राम आरा पंचायत का एक प्रमुख ग्राम है जो पंचायत से 06 कि.मी. की दूरी पर झारखण्ड सीमा पर स्थित है।

 

सकरडेगा ग्राम में उरांव जनजाति के अतिरिक्त मुण्डा, नगेसिया, गाडा, तेली, क्षत्रीयब्राहमण जाति के परिवार के लोग निवास करते है।

 

अध्ययन का उद्वेश्यः-

प्रस्तुत शोध अध्ययन के निम्न उद्वेश्य हैः-

1.    पंचवर्षीय योजना से जनजाति परिवार के रहन-सहन के स्तर को ज्ञात करना।

2.    शासन के योजनाओ से जनजाति परिवार के विकास की स्थिति एवं उनमें होने वाले परिवर्तन को ज्ञात करना।

 

अध्ययन पद्वति:-

प्रस्तुत अध्ययन में अध्ययनगत क्षेत्र ग्राम सकरडेगा के उरांव जनजाति के शतप्रतिशत अर्थात 31 परिवार का अध्ययन हेतु चुनाव किया गया है तथा अध्ययन इकाई के रूप में परिवार के मुखिया को उत्तरदाता के रूप में चुनाव किया गया है। चयनित उत्तरदाताओं से साक्षात्कार-अनुसूची एवं अवलोकन प्रविधि के द्वारा तथ्यों का संकलन किया गया हैं।

 

उत्तरदाताओं की आयु:-  

प्रस्तुत शोध अध्ययन  में अध्ययनगत उत्तरदाताओं के आयु को ज्ञात करने का प्रयास किया गया संकलित तथ्यों का विवरण तालिका क्रमांक 1 में दर्शाया गया है।

 

उत्तरदाताओं की आयु संबंधी उपरोक्त तालिका से ज्ञात होता है कि  अधिकतम 33.3 प्रतिशत उत्तरदाता 40-50 वर्ष आयु के, 34.3 प्रतिशत 30-40, 16.7 प्रतिशत 50-60 वर्ष,10.0 प्रतिशत उत्तरदाता क्रमशः 30 वर्ष तक एवं 60 वर्ष से अधिक  आयु समूह के है।

 

उत्तरदाताओं के परिवार में शिक्षा का स्तर:-

उरांव जनजाति परिवार में शिक्षा के विकास के मुद्वे पर शोध संगोष्ठी और मंचों पर कई बार लम्बी चर्चा हुई है जिसमें इस तथ्य को स्वीकार किया गया है कि वर्तमान झारखण्ड राज्य ब्रिटिश शासन काल में यह समुदाय ब्रिटिश मिशनरियों के सम्पर्क में आने तथा जगह-जगह मिशनरियों द्वारा स्कूल की स्थापना किया गया जिसका क्षेत्र के जनजाति पर इसका गहरा प्रभाव पडा है। ब्रिटिश मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन किये जाने से यह समुदाय दो भागों में विभक्त हो गई एक इसाई धर्मावलम्बी और दूसरा हिन्दू । चूंकि यह दोनों समूह वंश, गोत्र और टोटॅम के अनुसार दोनों में सामानता है और एक ही है जिसके कारण ये दोनों समूह बिना कोई विभाजन के साथ-साथ एक ही गांव में निवास करती है जिसके कारण दोनों ही समूह को ब्रिटिश शिक्षा संस्थाओं का लाभ मिला है यही कारण कि अन्य जनजातियों की अपेक्षा यह जनजाति समूह के लोगों में शिक्षा का स्तर उच्च है । प्रस्तुत अध्ययन में उत्तरदाताओं के परिवार में शिक्षा के स्तर को ज्ञात करने का प्रयास किया गया है । संकलित तथ्यों का विवरण तालिका क्रमांक 2 में दर्शाया गया है।

उत्तरदाताओं के शिक्षा संबंधी उपरोक्त तालिका से ज्ञात होता है कि अधिकतम 38.3 प्रतिशत उतरदाता प्राथतिक, 30.8 प्रतिशत निरक्षर, 10.3 प्रतिशत महाविधालय, 6.9 प्रतिशत हाईस्कूल, 5.4 प्रतिशत माध्यमिक, 3.3 हायर सेकण्डरी, 2.5 साक्षर (बिना औपचारिक शिक्षा के), 2.1 प्रतिशत तकनीकि शिक्षा एवं 01 चिकित्सा शिक्षा प्राप्त किये हैं

 

उपरोक्त संदंर्भ  में यह देखा गया कि कुल परिवार में 12 परिवार एैसे है जिनके परिवार में एक से अधिक सदस्य महाविधालय स्तर की शिक्षा प्राप्त किये है और वे वर्तमान में परिवार से बाहर जहां नौकरी करते है (नगरों में ) निवासरत है । इन परिवार में शासन के पंचवर्षीय  विकास योजनाओं का प्रभाव स्पस्ट दिखलायी पडता है तथा कुछ ऐसे भी परिवार है जिसके एक भी सदस्य महाविधालय स्तर की शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाये है ।

 

आजीविका के साधन में शासकीय योजनाओं की भूमिका:-

उरांव जनजाति प्रारम्भ से ही कृषि और वनोपज संग्रहण पर आजीविका के लिए निर्भर रही है तथा कृषि कार्य इनके संस्कृति में सामिल है कृषि भूमि नहीं होने पर यह दूसरों के कृषि भूमि में कृषि कार्य करता है । यह जनजाति कृषि कार्य आजीविका के लिए करती इसमें भी कई परिवार अपनी परिवार के वर्ष भर के लिए उत्पादन नहीं कर पाती इसका प्रमुख कारण कृषि भूमि का कम होना है । परन्तु बीतने और स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् समय-समय पंचवर्षीय योजनाओं का क्रियान्वयन किया गया जिससे जनजाति परिवार व्यापक रूप से प्रभावित हुआ है कई जनजाति समूह अपने जीवन स्तर को परिवर्तित करने में सफल हुआ है जिसमें झारखण्ड राज्य के मुण्ड, खडिया, संथाल, उरांव एवं छत्तीसगढ राज्य के हलवा, गोड, उरांव एवं खेरवार भील इत्यादि प्रमुख है। इन्हीं तथ्यों को आधार मानकर हमने ग्राम सकरडेगा के उरांव जानजति विकास में शासकीय योजनाओं की भूमिका को ज्ञात करने का प्रयास किया हैं जिसका विवरण तालीका क्रमांक 3 में दर्शाया गया है।

 

उपरोक्त तालिका से ज्ञात होता है कि अध्ययपगत गांव में कुल टोलों की संख्या 04 है, चारों टोला-पारा में परिवार की संख्या  32 हैकुल 32 परिवार में 119 पुरूष और 119 महिला सदस्य है  इस प्रकार गांव की कुल जनसंख्या 243 है तथा सभी परिवार के परम्परागत व्यवसाय कृषि है और कुल जनसंख्या में से 41 सदस्य सरकारी नौकरी करते है।

उपरोक्त तालिका के संदर्भ में अध्ययनगत गांव में यह पाया गया कि शतप्रतिशत परिवार का आजीविका का प्रमुख साधन कृषि है जिसमें अधिकांश परिवार के पास 7 एकड से कम कृषि से अधिक भूमि है। सरकार के योजनाओं का लाभ लेने में शिक्षा योजना ऐसे है जिसका लाभ लेकर गांव के 41 सदस्य सरकारी नौकरी कर रहे है। सरकारी नौकरी में 01 डिप्टी कलेक्टर, 01 एक.एल.आर, 03 सहायक प्राध्यापक तथा शेष स्कूल शिक्षक और भृत्य पद पर पदस्थ है, कुछ परिवार के युवक एवं युवतियां दिल्ली, मुंबई, गुजरात और केरल जाकर मजदूरी और नौकरानी का कार्य करके अपने जीवन स्तर को सुधार रहे है। वर्तमान में अधिकंश परिवार में हायर सेकण्डरी स्तर तक के शिक्षा प्राप्त  किये सदस्य है तथा कुछ ही परिवार में केवल पूर्व माध्यमिक और प्राथमिक स्तर तक ही शिक्षा प्राप्त किये है।

 

सरकार के योजनाओं का लाभ लेने में शिक्षा योजना ऐसे है जिसका लाभ लेकर गांव के 41 सदस्य सरकारी नौकरी कर रहे है। सरकारी नौकरी में 01 डिप्टी कलेक्टर, 01 एक.एल.आर, 03 सहायक प्राध्यापक तथा शेष स्कूल शिक्षक और भृत्य पद पर पदस्थ है, कुछ परिवार के युवक एवं युवतियां दिल्ली, मुंबई, गुजरात और केरल जाकर मजदूरी और नौकरानी का कार्य करके अपने जीवन स्तर को सुधार रहे है। वर्तमान में अधिकंश परिवार में हायर सेकण्डरी स्तर तक के शिक्षा प्राप्त  किये सदस्य है तथा कुछ ही परिवार में केवल पूर्व माध्यमिक और प्राथमिक स्तर तक ही शिक्षा प्राप्त किये है।

 

परिवार में आवश्यक संशाधनों का उपयोग करना:-

मनुष्य की आवश्यकतायें अनन्त होती है वह निरन्तर अपनी आय में सुधार करने के लिए प्रयत्नशील रहता है तथा जैसे-जैसे आय में वृद्वि होती है नित नई-नई वस्तुओं को जुटाता और उसका उपभोग करता चला जाता है, इससे व्यक्ति के जीवन मंे जिज्ञासा और उर्जा का संचार होता है । वर्तमान समाज में प्रतिष्ठा व संमान्न उसी व्यक्ति को प्राप्त होता है जो अधिक से अधिक भौतिक संशाधनो का उपभोग करता है यही कारण है कि मनुष्य में स्वाभाव से ही यह गुण व्यक्ति में विद्यमान होता है किन्तु इन साधनों का कोई व्यक्ति असानी से कम समय में प्राप्त कर लेता है जबकि कुछ परिवार अथव व्यक्ति कई पीढि से प्रयास करने बाद भी प्राप्त नहीं कर पाता है। शोध अध्ययन में प्राप्त तथ्य को तालिका क्रमांक 4 में दर्शाय गया है।

 

आधुनिक भौतिक संशाधनों के उपयोग करने संबंधी उपरोक्त तालिका से ज्ञात होता है कि 46.8 प्रतिशत उत्तरदाताओं के परिवार में कुर्सी-टेबल का उपयोग करते है जबकि 53.2 प्रतिशत उपयोग नहीं करते है। इसी तरह सोफा सेट का उपयोग केवल 2 परिवार करते है जबकि शेष 30 परिवार इसका उपयोग नहीं करते है। पलंग के उपयोग करने मेें 10 परिवार इसका उपयोग करता है तथा 22 परिवार में इसका अभाव है। इसी प्रकार ट््रजिस्टर का 15 परिवार में है और 17 परिवार में इसका अभाव है । साइकिल का उपयोग सर्वाधिक 96.8 प्रतिशत परिवार उपलब्ध है जबकि केवल  01 परिवार में साइकिल नहीं है। मोटर साइकिल न्यूनतम 05 परिवार में उपलब्ध है जबकि अधिकतम 27 परिवार में इसका अभाव है। ट््रेक्टर केवल 01 परिवार में उपलब्ध है एवं शेष परिवार में नहीं है। सिंचाई पम्प में 04  परिवार में यह साधन उपलब्ध है और शेष के पास नहीं है । अवास में विद्युत सुविधा केवल 11 परिवार में है जबकि 21 परिवार में यह सुविधा नहीं है ।  03 परिवार का अवास अर्धपक्का है तथा शेष परिवार का कच्चा अवास है। अवास में सौचालय सुविधा में में केवल 02 परिवार के अवकास में यह सुविधा है जबकि शेष उत्तरदाताओं के अवास में सौचालय की सुविधा नहीं है।

 

निष्कर्ष एवं सुझााव:-

अध्ययन में प्राप्त तथ्यों के विश्लेषण के आधार पर निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि अध्ययनगत गांव के उरांव जनजाति के लोगों में सरकार के पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत क्रियान्वित योजनाओं एवं कार्यक्रमों का 40.6 प्रतिशत परिवार प्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित हुआ है शेष 60 प्रतिशत परिवार अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित हुआ है।

 

गांव में कुल पारिवारिक सदस्यों का 66.7 प्रतिशत सदस्य साक्षर है, साक्षर सदस्यों का 18.5 प्रतिशत सदस्य उच्च शिक्षा प्राप्त किये है जिसमें 01 सदस्य पी-एच.डी. तथा 01 सदस्य एम.बी.गी.एस. अध्ययपरत है।

 

गांव के शप्रतिशत परिवार का वर्तमान व्यवसाय कृषि है किन्तु 15 परिवार ऐसे है जो सरकार के शिक्षा योजनाओं का लाभ लेकर सरकारी नौकरी में चयन होने से इनके परिवार के आर्थिक विकास में योजना कारगर सिद्व हुई है। जबकि केवल 08 परिवार ऐसे है जिनके पास 10 एकड से अधिक कृषि भूति है जिससे इनका आर्थिक स्तर अच्छी है तथ अधिकांश परिवार ऐसे है जिनके पास न तो कृषि भूमि अधिक है और न ही सरकारी नौकरी ऐसे परिवार मजदूरी पर आजीविका के लिए निर्भर है इन परिवारो में जो छोटा आकार का परिवार है इन्हें महात्मा गांधी राष्ट््रीय रोजगार गारंटी योजना में 100 दिन का रोजगार मिलने से जीविका के लिए सहायक हो रही है। अध्ययन से प्राप्त तथ्य के अनुसार गांव के केवल 04 परिवार बैंक में खात खुलवाया हैं।

 

अध्ययनगत गांव के परिवार के लोगों में आवश्यक संशाधनों के उपयोग करने में 01 परिवार ट््रेक्टर, 05 परिवार में मोटर साईकिल, 04 परिवार में सिंचाई पम्प, 03 परिवार अर्धपक्का मकान और कुर्सी-टेबल, सोफा सेट, पलंग, साईकिल जैसे आवश्यकता के आधुनिक संशाधनों का उपयोग करने के स्तर को प्राप्त करने में सफल हुए है।

 

गांव में केवल 02 परिवार के पास सौचालय की सुविधा है शेष खुले मैदान और जंगलों में सौच करते है इससे बरसात के मौसम में मलेरिया, टाईफाईड, डारीया की बीमारी से बडे तादत में सिकार होते है। इसी तरह गांव में स्वच्छ पेयजल का अभाव है शतप्रतिशत परिवार कुंआ से पेयजल आपूर्ति करता है जिससे बरसात में बीमारी का सामना करता है। गांव में प्राथतिक स्वास्थ्य केन्द्र का अभाव है यह सुविधा जंगल पार 6 कि.मी. दूरी पर है तथा सामुदायीक और जिला चिकित्सालय की सुविधा 25 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। अवागमन साधन में यह गांव प्रधानमंत्री ग्राम सडक योजना अन्तर्गत जिला मुख्यालय जुडा हुआ है तथा इसमें 01 बस की सुविधा है जो गांव से सुबह 10 बजे  जशपुर जिला मुख्यालय के लिए रवाना होती और शाम को 6.00 बजे गांव वापस आती है। 

 

सरकारी योजनाओं द्वारा जनजाति परिवार के विकास के लिए निम्न सुझाव कारगर सिद्व हो सकती हैः-

1.    शासकीय नौकरी में इनके लिये आरक्षण का प्रावाधान है किन्तु शिक्षा पूर्ण नहीं कर पाने के कारण अधिकांश परिवार सरकारी नौकरी से वंचित है एैसी स्थिति में सरकार को इन्हें स्वरोजगार से जोडने की अवश्यकता है इसके लिए बडे पैमाने पर स्वरोजगार योजना जैसे पशुपालन योजना अन्तर्गत इन्हें 15-20 जोडी बकरी उपलब्ध कराकर परिवार के दो सदस्यों इसी कार्य पर लगायी जाये तो महज चार-छः वर्षों  में इन्हें 4 से 5 लाख रूपये वार्षिक आय प्राप्त करायी जा सकती है इससे वे आथर्र््िाक रूप से आत्मनिर्भता हो सकेगें। इसी तरह कई कार्यक्रम है जैसे लाख की खेती, मछली पालन, दोना-पत्तल लघु उद्योग, मधुमखी पालनएवं तितर पालन, मसरूम की ख्ेाती इत्यादि।

2.    अधिकांश परिवार महात्मा गांधी राष्ट््रीय योजना का लाभ ले रहे है किन्तु इस योजना से केवल 100 दिन का रोजगार दिये जाते है इससे जिनका छोटा परिवार है और स्वयं की कृषि भूमि 3-4 एकड है इनके लिए यह मजदूरी पर्याप्त है। किन्तु भूमिहीन परिवार और बडे आकार के परिवार जिनके पास कृषि भूमि कम है ऐसे परिवार के लिए योजना से प्राप्त 100 दिन का रोजगार बहुत कम है क्योंकि परिवार के 03 सदस्य मजदूरी करने जाते है तो इन्हें  वर्ष में एक सदस्य को केवल 33 दिन ही रोजगार मिल पाता है इस प्रकार बडे परिवार के लिए यह योजना कारगर नहीं हो पा रही है।  ऐसे स्थिति में परिवार के आकार को आधार मानकर जरूरत मंद परिवार को वर्ष में कम से कम 180 दिन का रोजगार की व्यवस्था किये जायें तो निश्चित ही इससे जनजाति परिवार में बेरोजगारी को समाप्त किया जा सकेगा तथा आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और बचत करने की क्षमता इनमें विकशीत होगा इससे देश  देश का विकास होगा।

 

उपरेाक्त  सुझाव  के आधार पर विकास के प्रयास किया जाये तो निश्चित ही जनजाति विकास के क्षेत्र में बडा परिवर्तन को देखा जा सकता है अब तक किये नामात्र के अत्यन्त ही संक्षिप्त योजना निर्माण करने से योजना निर्माताओं को बचना चाहिए इससे धन और समय दोनो बर्बाद होते है परिणाम कुछ भी प्राप्त नहीं होते है जो अब तक होता आया है।

 

REFERANCE:-

1.    मेनन, पी.एस.के.,जनजातीय विकास: नीतियां, योजनाएं और कार्यक्रम, योजना, अंक-3,वर्ष-44,जून 2000, पृ.39.

1-     Chaudhari, M.K. and S. Basu.,by Chaudhari Buddhadeb, Tribal Development in problems and prospects, Inter –India Publication, New Delhi, p.353-370

2-     Aparajita, U., Culture and Devlopment :Dongarias of Niyamgiri, Tribal Studies of Orissa Deries T. 167, Inter-India Publication, New Delhi,1994,pp.116-117,154

4.    सिंह,अवधेश कुमार एवं बीरपाल सिंह, भारत में जनजातीय विकास, अवस्थिति एवं परिप्रेक्ष्य: माानव एथनोग्राफिक एण्ड फोक कल्चर सोसायटी, लखनउ, अंक-3,वर्ष-26,जुलाई-सितम्बर,1998,पृ.134-153

5.       Dalton, E.T., The Oraons, Descriptive Ethnology of Bengal, Section-1, 1872,p.215

6        India office of the Registrar General Vensus og India , Vol.-1, Issue-1,1961, p.67

7        Kurukh, Tribalzone.net.

 

 

Received on 11.01.2013

Revised on 05.02.2013

Accepted on 12.02.2013     

© A&V Publication all right reserved

Research J. Humanities and Social Sciences. 4(1): January-March, 2013, 76-81